“बरामदे की धूप” available in book format


bkd_back_pagebkd front pageIts an year and so, I haven’t update anything in blog. But good news is that I was trying to publish the content of blog in the form of book…and result is fruitful. All the poems of this blog are available in the form of book and e-book.You can buy it from online websites.

Hope all my readers love this sunshine of gallery.

And yes…this year I will be active…promise.

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बरसो हुए


कल वाले दिन अब परसों हुए
उस जुनू को जिये बरसो हुए

दिन कटता था जिसके दीदार में
उस इश्क़ को किये बरसो हुए

वो भी क्या दिन थे
लगता हैं सब कल परसों हुए

हाथो में हाथ हसीना का साथ
उसे बाँहों में भरे बरसो हुए

जिस मंज़र से की थी इस क़दर चाहत हमने
उस गली से गुजरे बरसो हुए

याद करता हैं वो चौक का चौकीदार हमें
इस मोहल्ले में चोरी हुए बरसो हुए

“ठाकुर” आ जाओ तुम फिर से अपने रंग में
कि तुम्हे भी किसी का दिल चुराये बरसो हुए

आशिकों कि ज़मात में एक तुम्हारा भी नाम हो
जो मिटाए ना मिटे फिर कितने भी बरसो हुए

मौसम


रूखे हाथो ने क्या सजावट की हैं
की आज फिर कोरे पन्नो पे लिखावट की हैं

सर्द हवाओ ने मेरी चौखट पे ये आहट की हैं
कि अल्फाज़ ही अब एक चीज़ राहत की हैं

समेट लू धूप की अब इसकी आदत सी हैं
या ओढ़ लू अंगारे की अब बात सेहत की हैं

मुझसे ना पूछो मेने ना कभी मोहब्बत की हैं
कि आशिको को किस मौसम ने राहत दी हैं

हमने तो अपनी ज़िन्दगी में यही इबादत की हैं
चार लफ्ज़ और एक अहसास से हमेशा चाहत की हैं

‘ठाकुर’ तुम्हारी गज़लों ने जब से सर्दियों की सोहबत की हैं
हर शख्स ने इस मौसम की हमसे शिकायत की हैं

मुसाफिर


आसरा मिला मुझे तो आसमानों से
मुसाफिरों को क्या मोहब्बत मकानों से !

आ जायेंगे हम तेरे एक बुलाने से
कि नाराज ना हो हमारे चले जाने से !

बचपन से ही रहते हैं हम दीवानों से
आजाद, बेखबर दुनियादारी के ख्यालो से !

जो मिला नहीं हमें इस शहर की दुकानों से
वो पाया हैं हमने इन रास्तो के मुकामो से !

आवाज़ आती हैं मंदिर, मस्जिद और मयखानों से
कि होती हैं इबादत भी हुनर के आजमाने से !

‘ठाकुर’ सुना हैं हमने ये अपने कानो से
कि लिखते हो तुम भी ग़ज़ल मस्तानो से !

सुनाते रहना यु ही अपनी दास्ताँ अल्फाजो से
कि ढूंडेंगी दुनिया एक दिन तुम्हे तुम्हारे निशानों से !

ख़ुशी


रुई का गद्दा बेचकर दरी खरीद ली,
ख्वाहिशो को कम किया और ख़ुशी खरीद ली !

कुछ पुरानी पतलून बेचकर चड्डी खरीद ली,
क्रिकेट को छोड़ा और कबड्डी खरीद ली !

सबने ख़रीदा सोना मेने सुई खरीद ली
सपनो को बुनने जितनी डोर खरीद ली !

मेरी एक ख्वाहिश मुझसे मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हँसी से मेने अपनी ख़ुशी खरीद ली !

इस ज़माने से सौदा कर एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और शामे खरीद ली !

सपनो के सिनेमा में एक सीट खरीद ली,
चुकाया पूरा बिल और पक्की रसीद ली !

रुई का गद्दा बेचकर दरी खरीद ली,
ख्वाहिशो को कम किया और ख़ुशी खरीद ली !

गुस्ताखी


किसका भला हुआ हुआ हैं किनारों पर बैठकर,
बेमौसम बारिश की बहारो को देखकर !

कभी देखना किसी माझी से पूछकर,
कितना मजा आया उसे तुफानो से खेलकर !

करते रहिये थोड़ी गुस्ताखी जानबूझकर,
खुदा भी खौफ खाता हैं खामोश चेहरों को देखकर !

वैसे खुश कोई नहीं यहाँ अपना आज देखकर,
रोता हैं हर कोई एक दुसरे का कामकाज देखकर !

में खुश हूँ मेरे यार का बसा घर संसार देखकर,
और मेरा यार खुश हैं मुझे अब तक आजाद देखकर !

खुश होते हैं वैसे लोग यहाँ आँखों को भी सेककर,
ठहरे हुए पानी में पत्थरो को फेंककर !

वो समझे हम भी चले जायेंगे चेहरे को घूरकर,
हम ठहरे ही रहे पर उनके ही दरवाजे पर !

खायी फिर उनकी गलियों में हमने इतनी ठोकर,
बिन पिए ही चलते हैं हम आज तक लड़खड़ाकर !

कहता हैं ये जमाना हमसे थोडा सा सब्र कर,
हम कहते हैं ज़माने से मिलते हे फिर कब्र पर !

जवान


साल दर साल मेरे ख्याल बदलने लगे,
उमर जो बढ़ी तो बाल पकने लगे !
वो मासूमियत तो बचपन कब का अपने साथ ले गया,
अब तो लड़कपन के मुंहासे भी सूरत से झरने लगे !
वो माँ हैं जो कहती हैं कि मैं अब भी बच्चा हूँ,
वरना कुछ लोग तो मुझे अभी से बूढ़ा भी कहने लगे !
ये आईना ही हैं जो अपने दाम का पूरा हक अदा करता हैं,
दाढ़ी मुछे जो हटाई तो गा्ल गुलाबी चमकने लगे !
हम निकले जब भी ऐसे सज-धजकर शहर के बाजारों से,
हसिनाओ की नजर ना पड़ी पर बुजुर्ग जरूर बातें करने लगे !
कुछ समझाइश देने लगे, कुछ खरीद-फ़रॉख्त करने लगे,
गोयाकी हम इश्क़ खरीदना चाहते थे और वो शहनाई बेचने लगे !
यहाँ सब लोग कहते हैं कि तुम जवान हो गए ठाकुर
पर लोगो के ऐसे जोक मुझे हैरान करने लगे !
कुछ हैं जो बहुत पीछे छोड़ आये हैं हम
याद वो आता नहीं पर हम इंतज़ार करने लगे !