मौत


छा गया अंधेरा बुझ गयी ज्योत
वक़्त की उंगलिया थामे लो आ गयी मौत

जुए का खेल था ये ज़िन्दगी का कारवा
जीते तो जीते चले गए और हारे तो लो आ गयी मौत

बड़ी चालाकी से चल रहे थे हम तो हर एक चाल यारा
पर चाल चली जब उसने तो लो आ गयी मौत

दाँव पर लगी थी साँसे हाशिये पर थे होश
पर होठो से ये कहते ना बनी कि लो आ गयी मौत

बचपन से बुढ़ापा तो हैं एक गोल चौराहा
एक उमर का चक्कर था और आ गयी मौत

किराये की काया को अपना मत समझ लेना “ठाकुर”
रूह को आज़ाद करने एक दिन तो आएगी मौत

“बरामदे की धूप” available in book format


bkd_back_pagebkd front pageIts an year and so, I haven’t update anything in blog. But good news is that I was trying to publish the content of blog in the form of book…and result is fruitful. All the poems of this blog are available in the form of book and e-book.You can buy it from online websites.

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बरसो हुए


कल वाले दिन अब परसों हुए
उस जुनू को जिये बरसो हुए

दिन कटता था जिसके दीदार में
उस इश्क़ को किये बरसो हुए

वो भी क्या दिन थे
लगता हैं सब कल परसों हुए

हाथो में हाथ हसीना का साथ
उसे बाँहों में भरे बरसो हुए

जिस मंज़र से की थी इस क़दर चाहत हमने
उस गली से गुजरे बरसो हुए

याद करता हैं वो चौक का चौकीदार हमें
इस मोहल्ले में चोरी हुए बरसो हुए

“ठाकुर” आ जाओ तुम फिर से अपने रंग में
कि तुम्हे भी किसी का दिल चुराये बरसो हुए

आशिकों कि ज़मात में एक तुम्हारा भी नाम हो
जो मिटाए ना मिटे फिर कितने भी बरसो हुए

शहनाईयां


घडीबंद बाँहों में गलबाहियां मचलती हैं
की अब हर तरफ बस शहनाईयां बजती हैं

बहुत सुना चुके हैं ये बाग हमें बाँसुरी
कि हर शाख से अब शहनाईयां ही बजती हैं

क्या फरक पड़ता हैं खाये हम तीखा या नमकीन
जुबाँ से तो शहद भरी शहनाईयां बजती हैं

लो बुला लो कुछ ढोल और नगाडो वालो को भी
वरना दिन-रात तो बस यहाँ शहनाईयां ही बजती हैं

जाने कहा खो गए हैं ये टिक-टिक करते समय के भी बोल
कि अब हर घडी में भी बस शहनाईयां ही बजती हैं

“ठाकुर” अपने अल्फाजो को थोडा गुनगुना भी लीजिये
क्योकि गज़लों में भी तुम्हारी अब शहनाईयां बजती हैं

रात


हर रात रूआसा कर जाती हैं
आसुओं का काम आसां कर जाती हैं

अखरती हैं अंगड़ाई कुछ इस कदर कि
नरम शैया भी डोलती नैय्या बन जाती हैं

ज़िन्दगी के बिस्तर पर किसी की कमी खल जाती हैं
जब अपनी आह किसी की आहट को तरस जाती हैं

और इस बात पर तबियत और बिगड़ जाती हैं
जब पडौसी के घर में रंगीन रोशनी दिख जाती हैं

वैसे जलने को तो अपनी लालटेन भी जल जाती हैं
पर उसकी रोशनी चाँद के आगे फीकी पड़ जाती हैं

पर क्या करे गिला हम चाँद के चमकने की भी
रात अमावस की उसके नसीब में भी तो आती हैं

ये बात नसीबो की अपनी समझ में नहीं आती हैं
खुद की कमियाँ बड़ी आसानी से इस लफ्ज़ में छिपाई जाती हैं

सुबह होते ही अक्सर ‘ठाकुर’ तुम्हारी आँख लग जाती हैं
वरना एक उजली किरण तो तुम्हारे नसीब में भी आती हैं

 

मौसम


रूखे हाथो ने क्या सजावट की हैं
की आज फिर कोरे पन्नो पे लिखावट की हैं

सर्द हवाओ ने मेरी चौखट पे ये आहट की हैं
कि अल्फाज़ ही अब एक चीज़ राहत की हैं

समेट लू धूप की अब इसकी आदत सी हैं
या ओढ़ लू अंगारे की अब बात सेहत की हैं

मुझसे ना पूछो मेने ना कभी मोहब्बत की हैं
कि आशिको को किस मौसम ने राहत दी हैं

हमने तो अपनी ज़िन्दगी में यही इबादत की हैं
चार लफ्ज़ और एक अहसास से हमेशा चाहत की हैं

‘ठाकुर’ तुम्हारी गज़लों ने जब से सर्दियों की सोहबत की हैं
हर शख्स ने इस मौसम की हमसे शिकायत की हैं