About Ankit Solanki

“I am the son of soil with head decorated by tattoo of technology and soul enriched by treasure of thoughts.”

मीडिया


ट्विटर पर ट्रेन्ड फॉलो होता हैं
ट्रूथ नही !
फेसबुक मे फेस पर लाइक मिलते हैं
फैक्टस पर नही !
समाचार चैनलो पर बहस होती हैं
बात नही !
अखबारो मे मसाला परोसा जाता हैं
मसला नही !
इस सबके बावजूद आप इन्हें मीडिया कहते हैं
तो आपको ये आइडिया नही !
कि मीडिया वो हैं जो आईना बने
नमूना नही !

मौत


छा गया अंधेरा बुझ गयी ज्योत
वक़्त की उंगलिया थामे लो आ गयी मौत

जुए का खेल था ये ज़िन्दगी का कारवा
जीते तो जीते चले गए और हारे तो लो आ गयी मौत

बड़ी चालाकी से चल रहे थे हम तो हर एक चाल यारा
पर चाल चली जब उसने तो लो आ गयी मौत

दाँव पर लगी थी साँसे हाशिये पर थे होश
पर होठो से ये कहते ना बनी कि लो आ गयी मौत

बचपन से बुढ़ापा तो हैं एक गोल चौराहा
एक उमर का चक्कर था और आ गयी मौत

किराये की काया को अपना मत समझ लेना “ठाकुर”
रूह को आज़ाद करने एक दिन तो आएगी मौत

अभिनय की चाय


बात ज्यादा पुरानी नहीं हैं, यही कोई जनवरी का महीना था |  मैं चाय बना रहा था और टीवी पर बालीवुड के अभिनेताओ की तुलना करते हुए कोई कार्यक्रम चल रहा था | वो अभिनेताओ को १, २, ३ ऐसे क्रम में बाँट रहे थे | खैर मुझे तो किसी भी कला में नाम कमा रहे लोगो में किसी को पहले नंबर पर रखना, किसी को दुसरे नंबर पर रखना कभी भी पसंद नहीं हैं, क्योकि मैं समझता हूँ कि कला एक साधना हैं कोई प्रतियोगिता नहीं | पर टीवी पर चल रही उस बहस ने मुझे एक कमाल का तुलनात्मक अध्ययन करने को प्रेरित किया | मैंने चाय बनाते हुए अभी के समय में लोकप्रिय ५ अभिनेताओ के अभिनय पर बारीकी से सोचा और ये रोचक निष्कर्ष निकाला –

  • सलमान खान – आप उन्हें पसंद करे या ना करे, पर निस्संदेह वो अभी के समय के सबसे बड़े स्टार हैं | एक अभिनेता के तौर पर लोकप्रिय बनाने वाला हर रसायन उनके व्यक्तित्व में मौजूद हैं | उनका अभिनय चाय की खुशबु के सामान हैं | आप चाहे जितना भी पानी डाले, दूध मिलाये, शक्कर और पत्ती से उकाले पर अंत में पीने वाले का मन तो उस चाय की खुशबु से ही भर जाना हैं | और लोग उस खुशबू के इतने दीवाने हैं कि वो सोचते ही नहीं कि चाय का रंग कैसा हैं, स्वाद कैसा हैं | उन्हें तो बस खुशबू का आनंद लेना हैं और उसी में खो जाना हैं |
  • शाहरुख़ खान – शाहरुख़ खान का अभिनय चाय को आँच पर रखकर दी जाने वाली उकाली जैसा हैं | एक अभिनेता के तौर पर उनकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण हैं कि फिल्म रूपी चाय बहुत उकलने वाली हैं | और इतना उकलने के बाद जब दर्शक इस चाय को पीता हैं तो उसे एकदम गहरे रंग की कड़क और झन्नाटेदार चाय का अहसास होता हैं | असल में शाहरुख़ के अभिनय में तीव्रता इतनी अधिक हैं कि फिल्म की दूसरी बाते बहुत पीछे छुट जाती हैं और दर्शक महसूस करते हैं तो उनके द्वारा निभाया गया किरदार | फिर चाहे वो डर/बाज़ीगर का सरफिरा आशिक हो या डीडीएलजे/कुछ कुछ होता हैं का बिंदास प्रेमी, कोच कबीर खान हो या मेजर राम…हर किरदार इतना उकाली लिया हुआ प्रतीत होता हैं कि देखने वाले को बस शाहरुख़ और शाहरुख़ ही याद रहते हैं |
  • आमिर खान – आमिर खान का अभिनय तौल-मौल कर बनायीं गयी उस चाय के जैसा हैं जिसमे सब कुछ बराबर हैं | चाय, शक्कर, दूध, पानी, अदरक और आँच – सब कुछ बराबर मात्रा में मिलाने के बाद जब इस चाय को कोई पीता हैं तो उसे संपूर्ण चाय का अहसास होता हैं | चाय का रंग, कड़कपन, मिठास, गर्माहट सब कुछ एकदम परफेक्ट लगता हैं | एक अभिनेता के तौर पर आमिर अपने आप को तो बहुत पीछे छोड़ देते हैं और कहानी में पूरी तरह रमे दिखाई देते हैं | इसीलिए तो फिल्म देखने के बाद लोगो को याद रहती हैं तो एक कहानी और उससे जुड़ा हर एक किरदार, ना कि आमिर खान | आप देख लीजिये कभी भी लगान, थ्री इडीयट, जो जीता वही सिकंदर या पीके, ये अपने आप में इतनी सम्पूर्णता वाली फिल्मे हैं कि आपको इनसे जुड़े हर एक किरदार, हर एक छोटी सी छोटी बातो से प्यार हो जाता हैं |
  • अक्षय कुमार – अक्षय कुमार का अभिनय पत्ती जैसा हैं | दूध चाहे जितना भी पड़े, पानी कितना भी मिले, शकर हो या ना हो और आँच बराबर लगे या ना लगे, रंग तो पत्ती को ही जमाना हैं | और अगर दूध, पानी और आँच भी बराबर मिल जाये तो इस चाय के क्या कहने | एक अभिनेता के तौर पर अक्षय कुमार में सब कुछ हैं, चालाकी भी तो मासूमियत भी, पौरुषता हैं तो भावुकता भी, अल्हड़ता हैं तो परिपक्वता भी | हर एक किरदार में अक्षय कुमार अपना एक अलग रंग दिखाते हैं और अपनी ऊर्जावान व्यक्तित्व से प्रभावित करते हैं | इसीलिए तो कुछ बेसिर-पैर की फिल्मो में भी अक्षय कुमार गज़ब का रंग जमाते हैं | और जब उन्हें अच्छी पटकथा और निर्देशन मिले तो वो इतना कमाल कर जाते हैं कि हर कोई यही बोलता हैं कि ये किरदार अगर अक्षय कुमार के अलावा के अलावा किसी और ने किया होता तो शायद वो मजा नहीं आता |
  • अजय देवगन – साधारण से दिखने वाले इस अभिनेता का अभिनय अदरक जैसा हैं, जिसे गली-मोहल्ले के कोने में मिट्टी से उखाड़ लिया हो और कूटकर चाय में उकाल दिया हो | और जब इस चाय को कोई पीता हैं तो चाय कि चुस्कियो के साथ गले में वो गज़ब का अहसास होता हैं कि हर कोई उस अदरक का कायल हो जाता हैं | अजय देवगन की खलिश भरी आवाज़ और समंदर से गहरी आँखे गज़ब का प्रभाव उत्पन्न करती हैं | इसीलिए तो ऐश्वर्या राय और सलमान खान की मौजूदगी से सजी रंग-रंगीली फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” देखकर निकले दर्शको को कुछ याद नहीं रहता सिवाय अजय देवगन के भाव-प्रणय अभिनय के | गंगाज़ल देखकर निकले दर्शक अपने अन्दर भ्रष्टाचार और अराजकता के प्रति गज़ब का गुस्सा महसूस करते हैं और हाल ही में दृश्यम देखने के बाद तो अजय देवगन हमको भी रटवा कर ही मानते हैं – २ अक्तूबर को हम पणजी गये थे नित्यानंद जी के प्रवचन सुनने |

खैर मेरी चाय तो इस ख्याल के साथ ही पक चुकी थी | आप भी आनंद लीजियेगा इस चाय का और बताइयेगा कि कैसी लगी ये पेशकश |

 

लघु कथा – आजकल तो बस फौग चल रहा हैं !


यू तो मध्य भारत का इंदौर शहर शुष्क स्थानों की गिनती में आता हैं, पर नवम्बर से जनवरी के बीच यहाँ भी अच्छी खासी ठण्ड का असर देखने को मिलता हैं | दिसम्बर के आखिरी दिनों में तो ये बिलकुल शिमला बन जाता हैं | गजब का कोहरा और सर्दी के आगोश में हर कोई ठिठुर जाता हैं | उस दिन भी कुछ ऐसा ही माहौल था, मुझे कुछ काम से सुबह ७ बजे ही शहर से बाहर जाना था | सुबह इतनी जल्दी उठकर नहाना और मोपेड चलाकर बस स्टेशन पहुचना ही बहुत दुष्कर कार्य था, पर मुझे तो अपनी सरकारी नौकरी का कर्तव्य पूर्ण करना ही था | सुबह उठने और नहाने में जरुर थोड़ी मुश्किल आई, पर बस में बैठकर बाहर का दृष्य देखा तो लगा कि प्रकृति के इस रूप को देखने के लिए इतना करना तो बनता हैं | पुरे साल में केवल २ या ४ दिन ही होते हैं जब शहर में इतना घना कोहरा होता हैं | बस में खिड़की वाली सीट पर बैठकर तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी | बस में दूसरी सवारी बैठ रही थी कि मेरे पास वाली सीट पर मेरे सहकर्मी मिश्रा जी आकर बैठ गए | वो भी बेचारे मेरी ही तरह इतनी सर्दी में अपनी नौकरी करने जा रहे थे | बस ने शहर की सीमा को पार किया और खिड़की के बाहर का नजारा तो और भी मनोरम होने लगा | हरे भरे पेड़-पौधों और खेतो पर जैसे किसी ने सफ़ेद चादर औढ़ा दी हो | जाने क्यों नींद के चक्कर में प्रकृति के इस रूप को देखने से मैं इतने दिनों तक वंचित रहा |

मैं खिड़की से प्रकृति के इन व्यंजनों का रसस्वादन करने में व्यस्त था की मिश्रा जी की आवाज़ ने मुझे ये अनुभुति कराई कि मैं बस में बैठा हु | मिश्राजी ने जेब से नया स्मार्ट फ़ोन निकाला और मुझे दिखाने लगे | “ये देखिये जी, नया स्मार्ट फ़ोन १३ मेगा-पिक्सेल कैमरे के साथ…पुराना ८ मेगापिक्सेल था अब १३ ले लिया ” | वैसे तो आजकल किसी के पास बढ़िया क्वालिटी का स्मार्ट फ़ोन होना कोई अचरज की बात नहीं हैं पर फिर भी मैं मिश्राजी का मन रखने के लिए उनका फ़ोन देखकर बधाई देने लगा | “ये देखिये व्हाटसैप फेसबुक सब चलता हैं इसमें” | वो मुझे फ़ोन की कार्य प्रणाली के बारे में बताने लगे | मैंने ध्यान से उन्हें सुना और फिर से प्रकृति की और रुख करने के लिए मिश्राजी से कहा – देखिये ना कितनी सर्दी हैं…फोग भी कितना हैं बाहर” | मैं इतना बोलकर फिर से बाहर का नज़ारा देखने ही लगा था कि मिश्राजी तपाक से बोले – “अरे इस पर भी एक बढ़िया जोक आया था व्हाटसेप पर – पत्रकारों ने मोदी जी से पूछा कि काले धन लाने की बात पर क्या चल रहा हैं ? तो मोदीजी बोले – आजकल तो बस फोग चल रहा हैं|” ये जोक ना जाने कितने रूपों में अलग ग्रुप से कई बार मेरे फ़ोन पर आ चुका था पर फिर भी मिश्राजी का मन रखने के लिए मैं मुस्कुरा दिया | इतने अच्छे और असली फोग वाले मौसम को देखने की बजाय फोग पर ऐसे उल-जलूल जोक सुनना मुझे कतई अच्छा विचार नहीं लगा | और मैं फिर से बाहर देखने लगा | पर मिश्राजी इतने में नहीं मानने वाले थे – “ये देखिये इस बन्दर का कितना अच्छा विडियो शेयर किया हैं व्हात्सप्प पर” इतना बोलकर वो मुझे बन्दर का विडियो दिखाने लगे जिसमे बन्दर पेड़ पर कूदा-फांदी कर रहा था | संयोग की बात हैं कि बस किसी गाँव से निकल रही थी और खिड़की से हमें भी कुछ बन्दर दिखाई दिए | मैंने मिश्राजी का ध्यान बाहर के बंदरो की तरफ करने की कोशिश की तो कहने लगे कि ये बन्दर वाला विडियो भारत का नहीं बल्कि अमेरिका का हैं | अब मुझे पता नहीं कि अमेरिका में भी बन्दर पाये जाते हैं कि नहीं, पर मिश्राजी को बन्दर के उस रिकार्डेड विडियो के स्थान पर लाइव प्रसारण देखना कतई मंजूर नहीं था | वो तो विडियो देखकर ऐसे ठहाके लगा रहे थे कि जैसे बंदरो की ऐसी हरकत पहली बार देखी हो | “ये देखिये मेरा एक दोस्त हैं – जहाँ जाता हैं वहाँ की मस्त फोटो फसबुक पर डालता हैं..अभी पिछले हफ्ते ही देहरादून होकर आया, वहाँ के प्राकृतिक द्रश्य के कितने अच्छे फोटो डाले हैं फेसबुक पर…देखिये जरा|” निस्संदेह देहरादून एक बहुत खुबसूरत शहर हैं और फोटो भी बहुत अच्छे थे, पर प्रकृति को 5 इंच में देखने की तुलना में आँखों की पलकों से क्षितिज तक देखना कही अधिक मनोहारी लगता हैं | और तो और, आज तो अपने क्षेत्र में ऐसा मौसम हैं कि वो किसी हिल स्टेशन से कम नहीं लग रहा हैं | पर मिश्राजी को ये कतई मंजूर नहीं था, वो तो मुझे अपने दोस्त की फेसबुक प्रोफाइल पर शेयर किये हुए पुरे 46 फोटो दिखाकर ही माने |

मिश्राजी मेरे संकोच का पूरा फायदा उठा रहे थे | एक-एक करके व्हात्सप्प-फेसबुक पर आये हुए चुटकुले, सन्देश, फोटो और विडियो मुझे दिखाने लगे | खुद ही दिखाते और खुद ही सबसे ज्यादा खुश होते | मुझे भी उनका साथ देने के लिए फालतू में ही मुस्कुराना पड़ रहा था | पुरे 2 घंटे के रस्ते में फ़ोन से नज़रे उठाकर एक बार भी इतने अच्छे मौसम को निहारना उन्हें अच्छा नहीं लगा | इतना अच्छा फोग, बन्दर और प्राकृतिक द्रश्य – सब कुछ तो बस की खिड़की से नज़र आ रहा था पर मिश्राजी को तो फोग वाले चुटकुले, बन्दर वाले विडियो और प्राकृतिक दृश्य वाली इमेजेस दिखाने की धुन लग गयी थी | खैर पुरे 24 चुटकुले, 61 चित्र, 18 सन्देश और 5 विडियो दिखाने के बाद जब हम अपने गंतव्य पर पहुचे तो दिल मिश्राजी से बस एक ही बात बोलना चाह रहा था – “मिश्राजी व्हात्सप्प-फेसबुक हमारे फ़ोन में भी चलता हैं और दोस्त हमारे भी हैं…इसलिए अब आगे से किसी को अपना फोन दिखाकर ऐसा बोर मत किया करो” |

Percentage of Truth


I know I am not good in analysis of facts because facts and feel may or may not reach at same conclusion. Here whatever be analysis I am showing is based on feel. Again, I am writing on very tough topic – truth. But I want to burn my hands in this analysis so that readers can understand my feel with these facts shown in graph. Truth is always universal but its interpretation is different by different souls and I firmly believe what our soul says is always 100% true. But listening our soul is always a difficult task because we are surrounded with the senses like ears and eyes which alter the truth. If not alter then also, these senses hides some percentage of truth and highlight remaining percentage of truth. Master of all these senses is our mind; he manipulates, mirrored, expand or narrowed the truth. These all senses act like some experts  debating on news channels for exploration for truth. But Truth is always there inside the human being, different people named it differently – soul, dharma, aatma, rooh, sixth sense etc etc.

So here is my analysis. Do let me know in comments section  if you think otherwise –

percentage of truth 2

ये दुनिया बहुत रंगीली हैं !


ये आसमान बहुत ऊचा हैं
ये धरती भी बहुत बड़ी हैं
तू आकर तो देख जरा
ये दुनिया बहुत रंगीली हैं !

सूंड वाला हाथी हैं
धारी वाली गिलहरी हैं !
फूल हैं खुशबु वाले
और हरी भरी तरकारी हैं !
आम हैं रसीला पर
खट्टी मीठी इमली हैं !
कौआ हैं काला कितना पर
रंगबिरंगी तितली हैं !
तू आकर तो देख जरा
कितनी खुबसूरत अपनी ये प्रकृति हैं !

आकाश में उड़ता कैसे कोई पंछी हैं
पानी में कैसे तैरती मछली हैं !
कैसे बादलो से बुँदे निकली हैं
और कैसे जलती ये माचिस की तीली हैं !
क्यों रेगिस्तान हैं सूखा और नदियाँ गीली हैं
क्यों पहाड़ हैं खड़ा और खाई गहरी हैं !
मूछ वाले हैं काका क्यों और
साड़ी वाली कैसे काकी हैं !
तू आकर तो सुलझा जरा
इस दुनिया में कितनी पहेली हैं !

सुबह हैं चमकीली और
शाम सुनहरी हैं !
दिन हैं उजालो वाला
पर रात अंधियारी हैं!
बारिश में निकलता छाता यहाँ
और सर्दियों में स्वेटर पहनना जरुरी हैं !
गर्मी कटे कैसे बिन कूलर के
हर मौसम की अपनी तैयारी हैं !
तू आकर तो देख जरा
हर दिन की यहाँ निराली कहानी हैं !

बादलो का हैं दोस्त तू
या सितारों की तू सहेली हैं !
आयेगा युवराज बनकर
या परी देस की शाहज़ादी हैं !
सूरत हैं कैसी तेरी
और किसने तेरी नज़र उतारी हैं !
पहचानेगा तू कैसे हमको
क्या तुझको हमारी जानकारी हैं !
तू आकर तो बता जरा
इस बात की बड़ी बेकरारी हैं !

ये आसमान बहुत ऊचा हैं
ये धरती भी बहुत बड़ी हैं
तू आकर तो देख जरा
ये दुनिया बहुत रंगीली हैं !