बरसो हुए


कल वाले दिन अब परसों हुए
उस जुनू को जिये बरसो हुए

दिन कटता था जिसके दीदार में
उस इश्क़ को किये बरसो हुए

वो भी क्या दिन थे
लगता हैं सब कल परसों हुए

हाथो में हाथ हसीना का साथ
उसे बाँहों में भरे बरसो हुए

जिस मंज़र से की थी इस क़दर चाहत हमने
उस गली से गुजरे बरसो हुए

याद करता हैं वो चौक का चौकीदार हमें
इस मोहल्ले में चोरी हुए बरसो हुए

“ठाकुर” आ जाओ तुम फिर से अपने रंग में
कि तुम्हे भी किसी का दिल चुराये बरसो हुए

आशिकों कि ज़मात में एक तुम्हारा भी नाम हो
जो मिटाए ना मिटे फिर कितने भी बरसो हुए

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3 thoughts on “बरसो हुए

    • All the content of this site is 100% original and written by me only – Ankit Solanki.
      (* except some free images that are copied from Google search)

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