खुदा के लिए


इस दुनिया में कुछ सच्चो को छोड़ दो
भगवान के लिए बच्चों को छोड़ दो !

करता हूँ सजदा जहाँ मैं वो मज़ार तोड़ दो
खुदा के लिए पर ये मासूम गुलज़ार छोड़ दो !

बैर अगर बुजुर्गों का हैं तो सजा बच्चों को क्यों
रोशनी के लिए कोई तो मशाल छोड़ दो !

जानते हैं नासमझ है नफरत तुम्हारी
पर नासमझी की भी कोई हद तो छोड़ दो !

इंसानियत की तो बात करना ही अब बेकार हैं
पर खुदा के लिए खुदा के तो निशान छोड़ दो !

बहुत हो चुका ये बरस बर्बरता का
जाते जाते तो प्यार के पैगाम छोड़ दो !

“ठाकुर” तुम अंदाजा भी नही लगा सकते उस बाप के दर्द को
जिसके घर में उसके जिगर के जनाजे को छोड़ दो !

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