पुल


सपने अपने होते हैं, हकीकत बेगानी होती हैं
जो मिल जाये ये दौनो तो महान जिंदगानी होती हैं !

वैसे ये ज़िन्दगानी भी किसी नदी की तरह होती हैं
इसके एक किनारे पर सपने तो दूजे पे हकीकत होती हैं !

दौ किनारों को मिला सके ये हुनर तो खुदा में भी नहीं
हम इंसानों की कोशिश तो इन किनारों पर पुल बनाने की होती हैं !

मिट्टी सपनो की होती हैं, पत्थर हकीकत के होते हैं
और जो जमा दे इन दोनों को वो पकड़ इरादों की होती हैं !

कमबख्त ये बहाव, उलझाव इरादों को पकड़ बनाने भी नहीं देता
जिस पत्थर को उठाओ उसकी मंशा बह जाने की होती हैं !

बस बहती नहीं हैं तो ये ख्वाहिश पुल बनाने की
इसकी इच्छा तो हरदम वक़्त को मुँह चिड़ाने की होती हैं !

पर ये वक़्त ये बहाव किसी का हमदम नहीं दोस्त
इसकी फितरत भी बस बह जाने की होती हैं !

“ठाकुर” वक़्त रहते अपना ये पुल बना लीजिये
ना जाने कौन सी घड़ी साँसों के बिखर जाने की होती हैं !

 

 

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