!!! चार – एक !!!


रोज की तरह उस दिन भी मैं पगडण्डी से होते हुए गाँव में जा रहा था | ‘सर, आज गाँव में मत जाइये और स्कूल भी बंद ही रखिये’, रास्ते में मिले तीन छात्रो ने मुझसे कहा | ‘क्यों, क्या बात हो गयी’ मेने आश्चर्य से पूछा | ‘आपको नहीं पता सर, कल गाँव में हिन्दू-मुसलमान के झगड़े हो गए | अपन ने उनके चार लोग निपटा दिए पर अपना भी एक मर गया |’ अपने छात्र के मुँह से ये बाते सुनकर मैं हतप्रभ रह गया, उसकी आवाज़ में एक आदमी के मरने के दर्द से ज्यादा चार लोगो को मारने की ख़ुशी थी | ‘ठीक हैं मैं वापस जाता हूँ, पर तुम लोग कहाँ जा रहे हो’ मेने गाड़ी मोड़ते हुए पूछा | ‘सर हम थाने जा रहे हैं, इसको थानेदार साहब ने बुलाया हैं | इसका बाप ही था वो एक आदमी जो अपना मरा हैं|’ तीनो में सबसे चुपचाप और दुखी छात्र की और इशारा करते हुए बाकि दोनों छात्रो ने मुझे बताया | मैं उन तीनो को गाड़ी से थाने छोड़कर वापस शहर लौट गया |

कुछ दिनों बाद गाँव में सब कुछ शांत हो गए | स्कूल भी पुनः शुरू हो गए | वो छात्र जिसका बाप मरा था, स्कूल में हमेशा बहुत चुपचाप और गुमसुम रहने लगा था | छः माही परीक्षा हुई और वो बालक सभी विषयों में अन्नुतीर्ण था | मुझे उस पर दया आ गयी और मेने समझाने के लिए उसे अकेले में बुलाया | ‘तुम सभी विषयो में फ़ैल हो’ मेने उससे कहा | ‘सर, वो मैं…मैं’ मेरी आवाज़ सुनकर वो डर गया और कुछ न बोल सका | मेने उसके सर पर हाथ रखा और समझाया – ‘तुम्हे तो ज्यादा पढने की जरूरत हैं, अभी बड़े होकर माँ का ख्याल भी तुम्हे ही रखना हैं’ | मेरा इतना कहना था कि वो फफक-फफककर रोने लगा | ‘सर, माँ भी यही कहती हैं | सबके सामने तो वो कुछ नहीं कहती पर अकेले में वो भी मेरी तरह गुमसुम रहती हैं और रोती रहती हैं |’ बालक ने रोते हुए मेरे सामने अपनी व्यथा रखी | ‘देखो तुम्हे हौसला रखना होगा, ऊपर वाला सब कुछ ठीक कर देगा|’ मेने उसे सांत्वना देते हुए कहा | ‘सर, जब मरना किसी एक को ही था तो भगवान ने मेरे बाप को ही क्यों चुना, किसी और को क्यों नहीं |’ बालक ने गीली आँखों से मेरी और देखते हुए कहा | उसके इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था, धर्म-युद्ध के इस मैदान में चार-एक की बढ़त पाकर भी शायद ये बालक अपना बहुत कुछ गँवा चूका था | मेने किसी तरह से उसे समझा-बुझाकर शांत किया और फिर कभी उसे भगवान के नाम का हौसला नहीं दिया |

 

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