गुस्ताखी


किसका भला हुआ हुआ हैं किनारों पर बैठकर,
बेमौसम बारिश की बहारो को देखकर !

कभी देखना किसी माझी से पूछकर,
कितना मजा आया उसे तुफानो से खेलकर !

करते रहिये थोड़ी गुस्ताखी जानबूझकर,
खुदा भी खौफ खाता हैं खामोश चेहरों को देखकर !

वैसे खुश कोई नहीं यहाँ अपना आज देखकर,
रोता हैं हर कोई एक दुसरे का कामकाज देखकर !

में खुश हूँ मेरे यार का बसा घर संसार देखकर,
और मेरा यार खुश हैं मुझे अब तक आजाद देखकर !

खुश होते हैं वैसे लोग यहाँ आँखों को भी सेककर,
ठहरे हुए पानी में पत्थरो को फेंककर !

वो समझे हम भी चले जायेंगे चेहरे को घूरकर,
हम ठहरे ही रहे पर उनके ही दरवाजे पर !

खायी फिर उनकी गलियों में हमने इतनी ठोकर,
बिन पिए ही चलते हैं हम आज तक लड़खड़ाकर !

कहता हैं ये जमाना हमसे थोडा सा सब्र कर,
हम कहते हैं ज़माने से मिलते हे फिर कब्र पर !

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