रोशन हैं जहाँ मेरा, तुम्हारी यादो के नूर से ……………..


Last Sunday was the first day of August and it celebrates as friend ship day in colleges. It was rain drops showering everywhere in Nagpur on that day and I was alone in room with my cup of tea and diary. Suddenly idea of this poem strikes in my mind. Today, I have completed this poem and publishing to my blog. This poem is especially dedicated to all my friends who are with me during school, college and job training days. They are the integral part of my memories and will remain wherever will be I in my whole life…..

तनहा रातो में, जब नींद नहीं आती हैं
आँखों को बंद करके भी, नजरे ये जागती हैं
करवटे बदलने से भी, करार नहीं मिलता हैं
संगीत सुनकर भी, सुकून नहीं मिलता हैं
रात की ख़ामोशी दिल को, तन्हाई की जेल में कैद कर देती हैं
और अँधेरा, कमरे को कालकोठरी में बदल देता हैं
घडी की सुइया, ठहरी हुई सी लगती हैं
और एक एक पल, जैसे सदियों की तरह कटता हैं

ऐसी उनींदे रातो में, किसी अपने की याद,बरबस ही आ जाती हैं
और हमारे दिल दिमाग को, गुजरे हुए दिनों में ले जाती हैं
वो बिता हुआ कल, फिर से जीवित हो उठता हैं
वो मंजर, वो मोसम, आँखों पर घर बनाने लगता हैं
उसकी बातो से होठ, मुस्कुराने लगते हैं
उसकी जुदाई में पलके, छलछलाने लगती हैं
वो दोस्त, वो मस्तिया, वो पुरानी जींस पहनने को मन करता हैं
वो स्कूल, वो कोलेज, उन गलियों से बाहर आना नागवारा लगता हे
यादो के उस नूर से चारो और, रोशनी आ जाती हैं
और दिल के गलियारों में, महफ़िल सी छा जाती हैं

वो बिसरे हुए दोस्त, पहली बारिश सा सुकून देते हैं
और उनके साथ बिताये पल, जीवन का आधार लगते हैं
हम उनकी यादो में ही पूरी ज़िन्दगी, बिता देना चाहते हैं
और चुपके से सूरज की किरणे, रात को छिपाने आ जाती हैं
हम बीते हुए कल में ही रह जाते हैं
और एक नया दिन आ जाता हैं………………….

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