हुए जब भी हम पर हसीनो के हमले,
याद नहीं रहा कब गिरे, कब सँभले !
फूल गुलाब से ये देखे या छूले,
सूखे न मुरझाकर इन्हें धुप से बचा ले!
सर्द हवाये न इनकी रंगत चुरा ले,
की आहो से इन्हें जरा हम फिक्रमंद कर दे !
ये मासूमियत ये अदा इनकी, बन न जाये कही अकड़ कल की
की नज़रो से हम इन अठखेलियो में, हमदर्दी-ओ-हया भर दे !
ज़ालिम ज़माना हे ज़रा जोर ज़बरदस्ती वाला,
की बाँहों में भरकर इन्हें हम महफूज़ कर दे !
शोहदों सा नहीं मिजाज़ मेरा, यहाँ गिरे, वहाँ फिसले
आशिक हु हुस्न-ए-जवाहरातो का, तुम्हे तराशे, तुम्हे सहेजे !
कोई बेवफा न कभी इनके नाजुक दिल को तोड़े
की सब हसीनो से हम अकेले ही वफ़ा निभा ले !!
Advertisement


Wah… Wah… Kya Ishq baya kiya hai
mast hai ek dum……. kuch dard-e-dil pr b likhna plzzzzzzzzz…..